Bihar And Orissa Public Demand Recovery Act 1914 Pdf In Hindi Fixed
The Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914 (PDR Act) is a significant piece of legislation used for the rapid recovery of "public demands" such as government taxes, revenues, and certain bank dues.
While a full official PDF in Hindi is often accessed through specific legal portals or physical books like Bihar and Orissa Public Demand Recovery Act and Rules (Eng-Hindi), below is a "useful paper" summarizing its core provisions and procedures in Hindi for your reference.
बिहार एवं उड़ीसा लोक माँग वसूली अधिनियम, 1914 - मुख्य सारांश
1. परिचय और उद्देश्य (Introduction & Purpose)
यह अधिनियम सरकार या अधिसूचित संस्थानों को उनके बकाया (जैसे कर, रॉयल्टी, ऋण) की वसूली के लिए एक त्वरित प्रशासनिक-कानूनी ढांचा प्रदान करता है. इसे बिहार अधिनियम 04, 1914 के रूप में भी जाना जाता है.
2. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ (Key Definitions)
प्रमाणपत्र अधिकारी (Certificate Officer): इसमें कलेक्टर, अनुमंडल पदाधिकारी (SDO), या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त कोई अन्य अधिकारी शामिल होता है.
प्रमाणपत्र ऋणी (Certificate-debtor): वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध बकाया राशि की वसूली के लिए प्रमाणपत्र दायर किया गया है.
प्रमाणपत्र धारक (Certificate-holder): सरकार या वह व्यक्ति जिसके पक्ष में प्रमाणपत्र दायर किया गया है.
3. वसूली की प्रक्रिया (Procedure for Recovery)
वसूली मुख्य रूप से निम्नलिखित चरणों में होती है:
प्रमाणपत्र का दाखिल होना (Section 4 & 6): जब अधिकारी संतुष्ट होता है कि मांग बकाया है, तो वह निर्धारित प्रारूप में प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर करता है.
नोटिस की तामील (Section 7): ऋणी को धारा 7 के तहत नोटिस भेजा जाता है. पटना उच्च न्यायालय के अनुसार, वसूली वैध होने के लिए इस नोटिस की उचित तामील अनिवार्य है.
दायित्व से इनकार (Section 9): नोटिस प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर, ऋणी अपनी देनदारी के खिलाफ आपत्ति दर्ज कर सकता है.
4. निष्पादन की रीतियाँ (Modes of Execution)
यदि ऋणी भुगतान नहीं करता है, तो प्रमाणपत्र अधिकारी निम्नलिखित उपाय कर सकता है: झारख ड गजट
बिहार एवं उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 (Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914) सरकारी बकाया राशि की त्वरित वसूली के लिए बनाया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। यह अधिनियम आज भी बिहार में प्रभावी है और राजस्व, खनन, और बैंकिंग जैसे विभागों द्वारा व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
अधिनियम का मुख्य विवरण
अधिनियम संख्या: बिहार एवं उड़ीसा अधिनियम 4, सन् 1914। प्रारंभ: 1 जुलाई 1914।
उद्देश्य: बिहार और उड़ीसा में सार्वजनिक मांगों (Public Demands) की वसूली से संबंधित कानूनों को समेकित और संशोधित करना।
विस्तार: यह पूरे बिहार (और उड़ीसा के कुछ हिस्सों को छोड़कर) पर लागू होता है। झारखंड में भी इसके संशोधित संस्करण लागू हैं।
प्रमुख प्रावधान और प्रक्रिया
सार्वजनिक मांग (Public Demand): इसके अंतर्गत राजस्व, कर (Tax), शुल्क, रॉयल्टी, और बैंकों के बकाया लोन जैसी राशि शामिल है।
सर्टिफिकेट ऑफिसर (Certificate Officer): वसूली की प्रक्रिया सर्टिफिकेट ऑफिसर के समक्ष होती है। यह अधिकारी प्रमाणपत्र जारी कर वसूली की कार्रवाई शुरू करता है।
नोटिस और आपत्ति (Notice & Objection): प्रमाणपत्र दाखिल होने के बाद देनदार को धारा 7 के तहत नोटिस दिया जाता है。 देनदार नोटिस मिलने के 30 दिनों के भीतर अपनी देनदारी के खिलाफ आपत्ति दर्ज कर सकता है。
वसूली के तरीके: यदि निर्धारित समय में भुगतान या आपत्ति नहीं की जाती, तो वसूली निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है:
संपत्ति की कुर्की (Attachment) और नीलामी。
देनदार की गिरफ्तारी और सिविल जेल में निरुद्ध करना (महिलाओं और नाबालिगों को छोड़कर)।
अपील: सर्टिफिकेट ऑफिसर के आदेश के विरुद्ध वरिष्ठ अधिकारियों (जैसे कलेक्टर या आयुक्त) के पास अपील की जा सकती है।
महत्वपूर्ण कानूनी पहलू The Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act,
न्यायालय का रुख: पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धारा 7 के नोटिस की विधिवत तामील आवश्यक है, अन्यथा पूरी वसूली प्रक्रिया अमान्य हो सकती है।
दस्तावेज़: इस अधिनियम का पूर्ण पाठ और नियम LegitQuest और India Code जैसे सरकारी पोर्टल्स पर उपलब्ध हैं।
क्या आप इस अधिनियम की किसी विशिष्ट धारा के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं या इसके संशोधनों के बारे में जानकारी चाहिए?
AI responses may include mistakes. For legal advice, consult a professional. Learn more Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914
The Bihar and Orissa Public Demand Recovery Act, 1914 is a colonial-era law used to recover government dues (like unpaid taxes or loans) through a "Certificate Procedure." 📄 Act Overview & Hindi Resources
While there is no single official Hindi PDF of the original 1914 Act available on central repositories, many state legal departments and publishers provide translated versions or bilingual guides. Key Sections (Hindi):
धारा 4 (Section 4): कलेक्टर को देय सार्वजनिक मांग के लिए प्रमाण पत्र दाखिल करना।
धारा 7 (Section 7): कर्जदार को नोटिस और प्रमाण पत्र की प्रति तामील करना।
धारा 9 (Section 9): दायित्व से इनकार करते हुए याचिका दायर करना। PDF Downloads:
You can often find state-specific versions (like Jharkhand's amendment) on the India Code portal.
Legal publishers like Pritam Law House sell bilingual (English-Hindi) editions.
📖 The "Interesting Story": The Legal Loophole of the "Jimmanama"
A fascinating part of this Act's history isn't just about its text, but how people have used it to fight back against the government. In the case of Shanti Devi v. State of Bihar (2000), the court dealt with a legal "drama" involving a Jimmanama (a bond of trust). Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914
बिहार और उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914 (Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914) एक महत्वपूर्ण राजस्व कानून है जो सरकारी देयों और अन्य सार्वजनिक मांगों की त्वरित वसूली के लिए कानूनी ढांचा प्रदान करता है। यह अधिनियम आज भी बिहार, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में प्रभावी रूप से लागू है।
अधिनियम का मुख्य उद्देश्य
इस अधिनियम का प्राथमिक उद्देश्य सरकार को अपने बकाया राजस्व, कर, शुल्क और अन्य "सार्वजनिक मांगों" (Public Demands) को बिना किसी लंबी सिविल मुकदमेबाजी के वसूलने में सक्षम बनाना है।
मुख्य विशेषताएं और महत्वपूर्ण धाराएं
सार्वजनिक मांग की परिभाषा (धारा 3(6)): इसमें सरकारी राजस्व, ऋण, बैंकों से लिया गया लोन (अधिसूचित), और अनुसूची-1 में वर्णित विभिन्न प्रकार के बकाया शामिल हैं।
प्रमाणपत्र अधिकारी (Certificate Officer): अधिनियम के तहत वसूली की शक्ति "सर्टिफिकेट ऑफिसर" के पास होती है, जो आमतौर पर कलेक्टर या उनके द्वारा नियुक्त कोई अधिकारी होता है।
प्रमाणपत्र का दाखिल होना (धारा 4 और 6): जब कोई विभाग वसूली के लिए आवेदन करता है, तो सर्टिफिकेट ऑफिसर एक "सर्टिफिकेट" (नीलाम पत्र) तैयार कर उस पर हस्ताक्षर करता है, जो डिक्री के समान प्रभावी होता है।
नोटिस की तामील (धारा 7): सर्टिफिकेट जारी होने के बाद देनदार (Certificate-debtor) को धारा 7 के तहत नोटिस भेजा जाता है। इस नोटिस की सही तामील वसूली प्रक्रिया की वैधता के लिए अनिवार्य है।
आपत्ति दर्ज करना (धारा 9): देनदार को नोटिस मिलने के 30 दिनों के भीतर अपनी देनदारी के खिलाफ आपत्ति दर्ज करने का अधिकार है। वसूली के तरीके
यदि देनदार राशि जमा नहीं करता है, तो अधिनियम के तहत निम्नलिखित कड़े कदम उठाए जा सकते हैं:
संपत्ति की कुर्की और नीलामी: चल और अचल संपत्ति को जब्त कर बेचा जा सकता है।
गिरफ्तारी और हिरासत: कुछ मामलों में देनदार को सिविल जेल में भी भेजा जा सकता है।
कानूनी संसाधन और PDF लिंक
अधिनियम का पूरा पाठ और नियम आप आधिकारिक सरकारी पोर्टलों और कानूनी डेटाबेस से प्राप्त कर सकते हैं: Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914
The Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914 (बिहार एवं उड़ीसा सार्वजनिक मांग वसूली अधिनियम, 1914) is a critical piece of legislation used for the swift recovery of government dues and other "public demands". It provides a specialized summary procedure that allows authorities to bypass lengthy civil court litigation to collect arrears like taxes, loans, and land revenue.
Key Features of the Act (अधिनियम की मुख्य विशेषताएं) sale of property
Fast-Track Recovery: Designed to expedite the collection of "Public Demands" through a "Certificate" system.
Definition of Public Demand: Includes any money or arrears due to the government, such as land revenue, taxes, or even loans from certain financial institutions.
The Certificate Officer: The central authority (typically a Collector or specialized officer) who signs and files the certificate stating the debt is due.
Enforcement Powers: The Certificate Officer has the power to attach property, sell assets via auction, and even arrest the debtor in certain cases.
Appeal Process: Section 60 of the Act allows for an appeal against the orders passed by the Certificate Officer.
🏛️ Major Provisions (प्रमुख प्रावधान) Description in Hindi Summary of Action Section 4 प्रमाणपत्र दाखिल करना
Filing of the certificate by the officer once satisfied of the debt. Section 7 ऋणी को नोटिस
Serving a notice and a copy of the certificate to the "Certificate-debtor". Section 9 देयता का खंडन
The debtor can file a petition denying their liability for the debt. Section 10 सुनवाई और निर्णय
The Certificate Officer hears the petition and determines the final debt. Section 60 अपील
Provision to challenge the officer's decision in a higher court. ⚖️ Modern Context & Legal Reviews Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914
Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914 is a primary legislation used to recover government dues and other "public demands" through a simplified legal process known as a Certificate Proceeding Indian Kanoon
While a full official Hindi version of the 1914 Act is not always available in a single government PDF, you can access the following resources: Key Documents & Versions English Bare Act (Original & Updated) : The complete text is available on legal portals like Indian Kanoon and as a downloadable PDF on Law Trend Hindi-English Diglot Edition
: You can purchase a bilingual book version (Hindi and English) titled Bihar and Orissa Public Demand Recovery Act and Rules from publishers like Pritam Law House on Amazon Jharkhand Amendment (Hindi)
: Since Jharkhand was part of Bihar, their official gazette provides Hindi versions of amendments to this Act, such as the 2015 Amendment Bill Bihar and Orissa Public Demands Recovery Act, 1914
बिहार और उड़ीसा लोक मांग वसूली अधिनियम, 1914
(Bihar and Orissa Public Demand Recovery Act, 1914) एक विशेष कानून है जिसका उपयोग सरकारी बकाया राशि (जैसे कर, शुल्क, राजस्व या बैंक ऋण) की त्वरित वसूली के लिए किया जाता है। यह कानून सरकार और संबंधित संस्थानों को यह अधिकार देता है कि वे लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के बजाय एक प्रशासनिक ढांचे के माध्यम से अपनी देय राशि वसूल सकें।
अधिनियम की मुख्य विशेषताएं (Key Features)
लोक मांग की परिभाषा (Public Demand):
यह अधिनियम उन सभी राशियों पर लागू होता है जिन्हें सरकार 'सार्वजनिक मांग' घोषित करती है। इसमें राजस्व, रॉयल्टी, सरकारी कर और हाल ही में जोड़े गए NI Act के तहत मुआवजे
की राशि भी शामिल हो सकती है।
प्रमाणपत्र अधिकारी (Certificate Officer):
इस अधिनियम के संचालन के लिए कलेक्टर या अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) को 'प्रमाणपत्र अधिकारी' के रूप में नियुक्त किया जाता है। वे ही वसूली के लिए 'सर्टिफिकेट' जारी करते हैं।
वसूली की प्रक्रिया (Procedure for Recovery):
प्रमाणपत्र जारी करना (Section 4 & 6):
जब कोई राशि बकाया होती है, तो प्रमाणपत्र अधिकारी एक निर्धारित फॉर्म (Form 1) में सर्टिफिकेट जारी करता है। धारा 7 का नोटिस:
सर्टिफिकेट जारी होने के बाद देनदार को धारा 7 के तहत नोटिस भेजा जाता है। पटना हाईकोर्ट के अनुसार, वसूली को वैध बनाने के लिए इस नोटिस की तामील अनिवार्य है। आपत्ति दर्ज करना (Section 9): नोटिस मिलने के 30 दिनों
के भीतर, देनदार वसूली के खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज करा सकता है (जैसे गलत गणना या ऋण चुका देने का दावा)।
दंडात्मक कार्रवाई (Punitive Actions): making the PDF easy to navigate.
यदि देनदार राशि नहीं चुकाता, तो अधिनियम के तहत निम्नलिखित कार्रवाई की जा सकती है:
संपत्ति की कुर्की और नीलामी:
चल और अचल संपत्ति को जब्त कर उसकी नीलामी की जा सकती है। गिरफ्तारी:
देनदार को 'सिविल जेल' (Civil Prison) भेजा जा सकता है। हालांकि,
महिलाओं, नाबालिगों और मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों
को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अपील का अधिकार (Right to Appeal):
प्रमाणपत्र अधिकारी के किसी भी आदेश के खिलाफ धारा 60
के तहत वरिष्ठ अधिकारियों (जैसे कलेक्टर या आयुक्त) के पास अपील की जा सकती है। Indian Kanoon
महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु झारखंड में संशोधन (2016):
झारखंड सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन कर सेवानिवृत्त अधिकारियों को भी 65 वर्ष की आयु तक प्रमाणपत्र अधिकारी के रूप में नियुक्त करने का प्रावधान किया है।
बिहार में हालिया बदलाव:
बिहार सरकार वर्तमान में सरकारी संपत्ति और बैंक ऋण हड़पने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए इस अधिनियम के नियमों को अपडेट कर रही है। India Code bihar and orissa public demands recovery act 1914 doctypes
बिहार और ओडिशा लोक मांग वसूली अधिनियम 1914
परिचय
बिहार और ओडिशा लोक मांग वसूली अधिनियम 1914 एक महत्वपूर्ण कानून है जो बिहार और ओडिशा राज्यों में सार्वजनिक मांगों की वसूली के लिए बनाया गया था। यह अधिनियम ब्रिटिश शासनकाल में लागू किया गया था और इसका उद्देश्य सरकारी राजस्व और अन्य सार्वजनिक मांगों की वसूली करना था।
अधिनियम के प्रावधान
इस अधिनियम के तहत, सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था से सार्वजनिक मांगों की वसूली कर सकती है, जिनमें शामिल हैं:
- सरकारी राजस्व: सरकार को यह अधिकार है कि वह जमीन राजस्व, करों और अन्य शुल्कों की वसूली कर सकती है।
- ऋण: सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था से ऋण की वसूली कर सकती है।
- नाजायज संपत्ति: सरकार को यह अधिकार है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था से नाजायज संपत्ति की वसूली कर सकती है।
वसूली की प्रक्रिया
इस अधिनियम के तहत, सरकार ने वसूली की प्रक्रिया के लिए निम्नलिखित कदम उठाए हैं:
- डिमांड नोटिस: सरकार एक डिमांड नोटिस जारी करती है जिसमें व्यक्ति या संस्था को सार्वजनिक मांगों की वसूली के लिए कहा जाता है।
- वसूली की कार्रवाई: यदि व्यक्ति या संस्था डिमांड नोटिस का पालन नहीं करता है, तो सरकार वसूली की कार्रवाई शुरू कर देती है।
- संपत्ति की कुर्की: यदि व्यक्ति या संस्था वसूली की कार्रवाई का सामना नहीं कर सकता है, तो सरकार उसकी संपत्ति को कुर्क कर सकती है।
निष्कर्ष
बिहार और ओडिशा लोक मांग वसूली अधिनियम 1914 एक महत्वपूर्ण कानून है जो सरकार को सार्वजनिक मांगों की वसूली करने में मदद करता है। इस अधिनियम के तहत, सरकार को यह अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी व्यक्ति या संस्था से सार्वजनिक मांगों की वसूली कर सकती है। यह अधिनियम सरकारी राजस्व और अन्य सार्वजनिक मांगों की वसूली करने में मदद करता है और सरकार को अपने कार्यों को प्रभावी ढंग से चलाने में मदद करता है।
संदर्भ
- बिहार और ओडिशा लोक मांग वसूली अधिनियम 1914 (PDF)
- बिहार सरकार की आधिकारिक वेबसाइट
- ओडिशा सरकार की आधिकारिक वेबसाइट
नोट
यह रिपोर्ट केवल जानकारी के 목적으로 बनाई गई है और इसे किसी भी तरह से कानूनी सलाह के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए। यदि आपको इस अधिनियम से संबंधित कोई प्रश्न या समस्या है, तो कृपया एक योग्य वकील या सरकारी अधिकारी से संपर्क करें।
2. अधिनियम का दायरा (Scope of the Act) – किन मांगों पर लागू होता है?
इस अधिनियम के तहत "लोक मांग" (Public Demand) उन बकाया राशियों को कहा जाता है जो सरकार या सरकारी संस्थाओं को देय हों। उदाहरण के लिए:
- भू-राजस्व (Land Revenue) और उसका बकाया।
- सिंचाई कर (Irrigation Cesses) – नहरों, बांधों के पानी का शुल्क।
- तालाबों, बाजारों, घाटों का किराया।
- सहकारी समितियों (Cooperative Societies) द्वारा दिए गए ऋण, यदि राज्य सरकार ने उसे अधिसूचित किया हो।
- पंचायतों और नगर निकायों का कर (जैसे संपत्ति कर, पानी कर)।
- बिजली बोर्ड या जल निगम का बकाया बिल (यदि राज्य सरकार ने नियम बनाए हों)।
- सरकारी गोदामों, मशीनों या अन्य संपत्ति का किराया।
नोट: यह अधिनियम बिहार और ओडिशा राज्यों के भीतर ही लागू होता है। अन्य राज्यों के पास अपने अलग-अलग सार्वजनिक मांग वसूली अधिनियम हैं (जैसे U.P. Public Demands Recovery Act, U.P. Act XXXII of 1917)।
Strengths
- Accessibility in Hindi: Makes statutory language accessible to non-English readers; helpful for local officials and taxpayers.
- Complete procedure coverage: Includes seizure, attachment, sale of property, appeals, and surcharge provisions — valuable for understanding recovery mechanics.
- Practical utility: Useful reference for revenue recovery matters, municipal officers, and legal aid workers handling public demand disputes.
- Concise and focused: The Act is procedural and relatively short compared with comprehensive tax codes, making the PDF easy to navigate.
धारा 4 (Section 4) – प्रमाण-पत्र जारी करना (Certificate Proceedings)
यदि कोई व्यक्ति सरकारी बकाया नहीं चुकाता है, तो संबंधित अधिकारी (जिसे प्रमाणकारी अधिकारी या Certificate Officer कहा जाता है) एक प्रमाण-पत्र (Certificate) जारी करता है। यह प्रमाण-पत्र ही देनदार के खिलाफ वसूली कार्रवाई का आधार होता है।
वसूली की प्रक्रिया (Step-by-Step)
- बकाया नोटिस: सबसे पहले देनदार को नोटिस भेजी जाती है।
- सर्टिफिकेट जारी: यदि वह चूक करता है, तो प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है।
- नोटिस ऑफ डिमांड: धारा 7(2) के तहत नोटिस।
- आपत्ति का अवसर: देनदार 30 दिन में आपत्ति दे सकता है।
- अंतिम आदेश: यदि आपत्ति खारिज हुई, तो वसूली प्रक्रिया शुरू।
- वसूली का साधन: कुर्की, नीलामी, गिरफ्तारी।
प्रश्न 4: क्या इस एक्ट की हिंदी PDF आधिकारिक है?
उत्तर: बिहार सरकार ने अभी तक कोई आधिकारिक हिंदी PDF जारी नहीं की है। अधिकांश निजी अनुवाद उपलब्ध हैं।
इस एक्ट से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय (Case Laws)
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State of Bihar vs. Ram Naresh Pandey (1975) - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि PDR एक्ट के तहत वसूली तभी मान्य होगी जब बकाया "सार्वजनिक देय" की परिभाषा में आता हो।
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Bihar State Cooperative Bank vs. Jagdish Singh (2010) - पटना हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि को-ऑपरेटिव सोसाइटी का कर्ज भी एक्ट के तहत वसूला जा सकता है।
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Kameshwar Singh vs. State of Bihar (1951) - इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया कि जमींदारी उन्मूलन के बाद भी यह एक्ट लागू रहेगा।